वो कौन थी
बरसों से थी उसकी मुझे बर्बाद करने की शाजिश,,
न जाने उसे इतनी हिम्मत कौन दे गया.............
ये दर्द और तन्हाई की आग अब बुझती नहीं,,
पता नहीं इसे इतनी हवा कौन दे गया.........
यूँ तो हँसते रहते थे हमेशा,,
मगर यूँ हँसते हँसते रोने की सजा कौन दे गया......
तन्हाई,बेबसी,आंसू अब थमते नहीं,,,
इन्हें मेरे घर का पता कौन दे गया........
सोये नहीं हैं सदियों से,,
पता नहीं इन आँखों से नींद कौन ले गया........
लिखना नहीं आते थे दो शब्द भी ,,
मगर ना जाने ये लिखने का हुनर कौन दे गया.....
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